गुरुवार, 24 जून 2010

आदमी के अभयारण्‍य

शेर - चीतों के बाद
अब आदमी के भी
बनने लगे हैं अभयारण्‍य
शुभ्र धवल छंटी हुई दाढ़ी
और चश्‍मे के भीतर से चमकती
उस दरिंदे की आंखों को तो देखो
एक मिटती प्रजाति है यह
पर एक पूरा राज्‍य है
इसके हवाले

ओह
कैसी गझिन
रक्‍तश्‍लथ है
हंसी इसकी
इस रक्‍तपायी की जीभ तो
दिखती नहीं कभी
सारे रक्‍तचिन्‍ह
चाट गया है यह
बस इसकी दाढ़ों में लगा
बच रहा है खून।

1 टिप्पणी:

संभावनाओं का शहर ने कहा…

इन पंक्तियों के लिए आपका आभारी हूँ मुकुल जी

" शुभ्र धवल छंटी हुई दाढ़ी
और चश्‍मे के भीतर से चमकती
उस दरिंदे की आंखों को तो देखो
एक मिटती प्रजाति है यह
पर एक पूरा राज्‍य है
इसके हवाले "

मुखर बौद्धिक कवि : कुमार मुकुल ... कृष्ण समिद्ध

( आज मुकुल जी को दुसरी बार सुना...मुझे उनके स्वेत धवल बालों से जलन हैं...वो मुझे भी चाहिए था .) कविता तब दीर्घजीवी होती है ....जब समय को ...