शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

खुशी की आत्‍मा खुशी के पैरों में निवास करती है ...

खुशी का चेहरा

खुशी को देखा है तुमने क्‍या कभी
श्रम की गांठें होती हैं उसके हाथों में
उसके चेहरे पर होता है
तनाव-जनित कसाव
बिवाइयॉं होती हैं खुशी के तलुओं में
शुद्ध मृदाजनित

खुशी की
हथेलियॉं देखी हैं तुमने
पतली कड़ी लोचदार होती हैं वो
जो अपनी गांठें
छुपा लेती हैं अक्‍सर
अपनी आत्‍मा में
उस पर चोट करो
देखों कैसे तिलमिलाकर
उभर आती हैं गांठें

चेहरे के तनावजनित कसावों को
छेड़ने से ही
फूटती है हँसी
ध्‍वनि की तरह

तलुओं में ना हों तो
खुशी की स्‍मृत्तियों में
जरूर होती हैं बिवाइयॉं
वहॉं झांकोगे
तो फँसी मिटटी पाओगे
उसे मत निकालना गर्त्‍त से
रक्‍त
फूट पड़ेगा उनसे

बड़े गहरे संबंध होते हैं
मिटटी के और रक्‍त के
सगोत्रिय हैं दोनों

अपनी आत्‍मा को
जानते हो तुम

खुशी की आत्‍मा
खुशी के पैरों में निवास करती है
तब ही तो
इतनी तेज दौड़ती है खुशी
एक चेहरे से
दूसरे तीसरे व तमाम चेहरों पर

कभी खुश हुए हो तुम
श्रम
किया है क्‍या कभी
दौड़े हो घास पर नंगे पॉंव
या फिर रेत पर
तो तुमने जरूर देखा होगा
कि कैसेट
हमारे पॉंवों में पैसी आत्‍मा
मिटटी से
चुगती है संवेदना
और कैसी तेजी से
हरी होती हैं
मस्तिष्‍क की जड़ें

यहॉं से वहॉं उड़ान भरती
कैसी उन्‍मुक्‍त होती है हँसी
और निर्द्वांद्व कितनी
कि पकड़ में नहीं आती कभी
कैमरे में बंद करो
तो तस्‍वीरों से फूट पड़ती है
मन में बंद करो
तो आंखों से

क्‍या करे वह
कि समय कम है उसके पास
और
असंख्‍य हैं मनुष्‍य
पीड़ा से बिंधे हुए
और सब तक जाना है उसे

खुशी की
ऑंखें होती हैं हिरणी सी
विस्‍फारित तुर्श साफ व सजल
छोटी सी पीड़ा भी
डुला देती है उसे
बह आता है जल
टप-टप-टप

बड़ा गम भी
पचा लेती है खुशी
कभी वही
गॉंठ बन जाती है
कैंसर की

पर श्रम की गॉंठ
जि‍यादा कड़ी होती है
गम की गॉंठ से
उसे गला देती है वह

खुशी जानती है
कि जियादा से जियादा
क्‍या कर सकता है गम
उसे माटी कर सकता है

मिटटी की तो
बनी ही होती है खुशी
खिलौनों सी
उसके टूटने पर बच्‍चे रोते हैं
कुम्‍हार नहीं रोता
वह जानता है श्रम को
पहचानता है खुशी को
गढ लेगा वह और और नयी

बारह से
पॉंव होते हैं खुशी के
मृगनयनी होती है
पर मृगमरीचिका नहीं देखती खुशी

पहले
कड़कती है बिजली
फिर होता है बज्रप्रहार

गरजता

जैसा आता है दुख
वैसा ही चला जाता है
पर चक्रवातों और
दुख की सूचनाओं की तरह
सन्‍नाटे का
व्‍यामोह नहीं रचती खुशी
आना होता है
तो आ जाती है चुप-चाप
भंग करती सन्‍नाटा

आती है
तो जाती कहॉं है खुशी
रच-बस जाती है सुगंध सी
खिला देती है
पंखुडि़यों को
फिर बंद कहॉं होती हैं पंखुडि़यॉं
झर जाऍं चाहे

गमों में
सब छोड़ देते हैं दामन
तो बच्‍चे
थाम लेते हैं खुशी को
और भरते हैं कुलॉंच

तब बड़े नाराज होते हैं
उन्‍हें मारते हैं चॉंटे
और खुद रोते हैं

कुत्‍ते की तरह
हमेशा
हमारे आगे-आगे
भागती है खुशी
बच्‍चों सी आगे आगे
साफ करती चलती है रास्‍ता

वह देखती है पहाड़
और चढ़ जाती है दौड़ कर
वहीं से बुलाती है

नदी को देखते ही
गुम हो जाती है
भँवरों में

जंगल को देखते
समा जाती है दूर तक
फिर कहीं से
करती है
कू-कू-कू
हम भागते हैं उसे पाने को
भागते चले जाते हैं
हॉंपते ढहते ढिलमिलाते
उसी की ओर

जंगल काटते हैं
और बनाते हैं पगडंडियॉं
भँवरों से लड़कर
बनाते हैं पुल
पत्‍थरों को छॉंट
चढते हैं पहाड़

शायद इसी तरह बने हैं
तमाम रास्‍ते सभ्‍यता के

खुशी को ढूंढता
कोलंबस
अमरीका ढूंढ लेता है

एवरेस्‍ट तक
हमें खुशी ले जाती है

चॉंद पर
जाती है खुशी
और कहती है
मंगल पर चलो

कभी
पीछे लौटकर नहीं देखती खुशी
स्‍मृतिविहीन अतीत का रास्‍ता
नहीं होता है उसका
डायनासोर मिलते हैं जहॉं
जो अपना भविष्‍य
खुद खा जाते हैं।

1 टिप्पणी:

arun c roy ने कहा…

मुकुल जी नमस्कार ! श्रम को ख़ुशी के साथ जोड़ा है और श्रम को इतना व्यापक आयाम दिया है आपने... अदभुद ! ए़क सार्थक और संवेदनशील रचना...

फेशबुक - एक आत्‍मालोचना

अपना चेहरा उठाए खडे हैं हम बारहा मुकाबिल आपके अब आंखें हैं पर द़ष्टि नहीं है मन हैं पर उसकी उडान की बोर्ड से कंपूटर स्‍क्रीन तक है...