बुधवार, 21 जुलाई 2010

आ चुकी है शताब्‍दी - कविता - कुमार मुकुल

आ चुकी है शताब्दी ( एक्सप्रेस )
राजकमल के प्रिय रंग आसमानी से रंगी
चेतन होते तो कहते : क्या सेक्सी गाड़ी है
तभी तो हर चौथा कांच अपने अनोखे खूबसूरत तरीके से
चनका है गोलाई में
एक कृत्रिम फूल खिलाता सा

बाहर हवा तेज है और बौछारे भादों की
झूमते से पेड़ और चिमनियां भट्टे की स्थिर-अवाक
पर भीतर मौसम थिर है खुशनुमा
बीच में दीवार है शीशे की
जिस पर बूंदों की चित्रकारी जारी है
वे ठुमकती सी तिरछे सरक रही हैं - नीचे
शीशे से टकरातीं
चर-चर की धीमी आवाज करतीं
बाहर कितनी हरियाली है
भागती सी कहीं कहीं जुते खेत हैं
पानी के चहबच्चों से जगमगाते
प्रतिबिंबित करते आकाश
पटरियों के किनारे-किनारे काश है
अपने साम्राज्य पर फूली नहीं समाती सी झूमती
और एक आध पंछी
भीगे पंख झटकारते

पी जा चुकी है चाय
नाश्ता तैयार हो रहा है-
अजय मिश्र के शब्दों में-
यहां भी वहीं अकाटू-बकाटू लोग हैं
धीमे पुराने फिल्मी संगीत में डूबते-ऊबते
एक पहाड़ी लड़की
अपनी बेबसी झाड़
हवा में घूसेबाजी करती
लंबे बालों वाले अपने साथी से कुछ कह रही है
ओह-कोई याद आने लगा है और मैं होता जा रहा हूं
परिदृश्य से ओझल।

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