मंगलवार, 21 सितंबर 2010

और यथार्थ भी एक दिन दु:स्‍वप्‍न हो जाता है

और यथार्थ भी
एक दिन
स्‍वप्‍न हो जाता है

आपके कांधे से लग
...बिहंसती खुशी
कैद हो जाती है
आइने में अपने ही

खुद पर रीझती और खीझती
उसकी आवाज
अब दूर से आती सुनाई पडती है

दुविधा की कंटीली बाड
कसती जाती है घेरा

और जीने का मर्ज
मरता जाता है
मरता जाता है...

2 टिप्‍पणियां:

sada ने कहा…

बहुत ही सुन्‍दर एवं भावमय प्रस्‍तुति ।

वन्दना ने कहा…

बहुत खूब कहा।

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