शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

मनोविनोदिनी

खाना खा लिया
कवि महोदय ने
सतरह नदियों के पार से
आता है एक स्‍वर
चैट बाक्‍स पर
छलकता सा
हां
खा लिया...
आपने खाया
हां ... खाया
और क्‍या किया दिन भर आज
आज...
सोया और पढा ... पढा और सोया
खूब..
फिर हंसने का चिन्‍ह आता ह
तैरता सा

और क्‍या किया

और..

माने सीखे तुम के

मतलब...

मतलब ... तू और मैं तुम

हा हा

पागल...

यह क्‍या हुआ

यह दूसरा माने हुआ
तू और मैं का

दूसरा माने

वाह

खूब
हा हा
हा हा हा


मनोविनोदिनी - 2

यह
दूसरी बार
सुन रहा था
उसे

खिलते पुष्‍पों से
एक वृत्‍त में खुलते
स्‍वरों के पीछे

खल-खल करता

एक अन्‍य स्‍वर

यह खल-खल

सुनने नहीं दे रही थी
ठीक से
कुछ और

जो कहा जा रहा था

मैं उसे सुनना चाह रहा था


एक मधुरिल स्‍वर

पगा हूं

जिसमें मैं

उसे घोलती सी
यह स्‍वर लहरी
मेरे बाहर
जाने कहां
गिर रही थी

मनोविनोदिनी - 3

संवाद तो
होता ही रहता है

पर कुछ कहना
रह जाता है बाकी

सो उसका नाम

पुकारना चाहता हूं

जोर जोर से .......


उससे
यह सब कहूं
तो कहेगी
पागल.......

फिर खुश होउंगा
बेइंतहां

तब
कहेगी वह
सुधर जाइए
अब भी

अच्‍छा नहीं
यह

3 टिप्‍पणियां:

डॉ .अनुराग ने कहा…

पहली तो जैसे आइना है..............ओर चौथी मन के जंगल में विचरते किसी जीव का हलफनामा !!!!!

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है।

leena malhotra ने कहा…

adbhut rachnaaye man kee khidkyaa khol kar aatma ko choo gai. sabhaar.

मुखर बौद्धिक कवि : कुमार मुकुल ... कृष्ण समिद्ध

( आज मुकुल जी को दुसरी बार सुना...मुझे उनके स्वेत धवल बालों से जलन हैं...वो मुझे भी चाहिए था .) कविता तब दीर्घजीवी होती है ....जब समय को ...