गुरुवार, 30 सितंबर 2010

नदी - दो कविताएं

अरसा बाद
मिल रहा था उससे

मेरा वर्तमान कांप रहा था
उसकी आंखों में
गहराइयां
खींच रही थीं उसकी

सो
उतरता चला गया

ठेहुने-कमर-कंधे
और अब
गले लग रहा था उसके

अंत में
सांसें रोक
डुबकियां लगा दी मैंने।

नदी - दो

उतरना तो मैं
उसके वर्तमान में
चाह रहा था
पर
बार - बार
चला जा रहा था
स्‍मृतियों में उसकी

परेशान हो
अपनी जमीन
खींच ले रही थी वह
बार-बार

मैं संभलता
फिर बहने लगता
अतीत की रौ में

आखिर
एक ज्‍वार आया
और उब-चूब होने लगा मैं
सांसें
फूलने लगीं

और अब
वर्तमान ही वर्तमान था

भिगोता
रग-रग।

Nai Dunia me prakashit

2 टिप्‍पणियां:

sada ने कहा…

उतरना तो मैं
उसके वर्तमान में
चाह रहा था
पर
बार - बार
चला जा रहा था
स्‍मृतियों में

बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां ।

Shiv Nath Kumar ने कहा…

आपकी कविता अच्छी लगी ,
बड़े ही सहज ढंग से आपकी कविता पाठकों से संवाद करती है |

फेशबुक - एक आत्‍मालोचना

अपना चेहरा उठाए खडे हैं हम बारहा मुकाबिल आपके अब आंखें हैं पर द़ष्टि नहीं है मन हैं पर उसकी उडान की बोर्ड से कंपूटर स्‍क्रीन तक है...