शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

कवि रिल्‍के के लिये

जब वह
कलम पकडता है
तो देवता लोटने लगते हैं
उसके कदमों की धूल में
पुनर्जन्‍म के लिये
तब
अपनी निरीहता और विस्‍फार
उन्‍हें सौंपता हुआ
रचता है वह उन्‍हें
खुद को प्रकृतिमय करता

सोचता
कि प्रबल होते मनुष्‍य की
नित नूतन कल्‍पना
कहां तक
संभाल सकेगी
इस अबल का बोझ।

2 टिप्‍पणियां:

गजेन्द्र सिंह ने कहा…

अच्छी पंक्तिया की रचना की है ........

कृपया इसे भी पढ़े :-
क्या आप के बेटे के पास भी है सच्चे दोस्त ????

बेचैन आत्मा ने कहा…

हमनी के देश काहे हो जाला राउर नेशन
काहे करींला रउआ भेद-भाव अइसन।
..इस ब्लॉग में आकर यहीं गुम हो गया!

फेशबुक - एक आत्‍मालोचना

अपना चेहरा उठाए खडे हैं हम बारहा मुकाबिल आपके अब आंखें हैं पर द़ष्टि नहीं है मन हैं पर उसकी उडान की बोर्ड से कंपूटर स्‍क्रीन तक है...