शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

अपने कवि होने की बुनियाद

चुप किया जाना
एक सजा है तुम्‍हारी खातिर

जबान और हाथों को जब
रोक दिया जाता है
शालीन अश्‍लीलता से
तो असंतोष की किरणें
फूटने लगती हैं
तुम्‍हारी निगाहों से
और कई बार
उसकी मार तुम
अपने भीतर मोड देती हो

तब
तुम्‍हारे मुकाबिल होना
एक सजा हो जाता है
मेरे लिये

एक सजा
जिसे पाना
अपनी खुशकिस्‍मती समझता हूं मैं

मेरी कुटुबुटु
कि
हमारा रिश्‍ता ही दर्द का है
जिसकी टीस को
जब संभाल लेती है मेरी कविता
तब कविता का महान व्‍योपार
कर पाती है वह
तब
देख पाता हूं
जान पाता हूं मैं
अपने कवि होने की बुनियाद।

6 टिप्‍पणियां:

Sunil Kumar ने कहा…

सुंदर रचना के लिए साधुवाद

डॉ .अनुराग ने कहा…

अद्भुत!!!!!

वन्दना ने कहा…

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें।

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (18/10/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा।
http://charchamanch.blogspot.com

अनुपमा पाठक ने कहा…

sundar rachna!
kavi hriday hi kavi hone ki buniyad jaan sakta hai!
kavi hriday aur unki kavita ko naman!
regards,
nice blog!!!

रचना दीक्षित ने कहा…

अच्छी लगी ये पोस्ट

Dorothy ने कहा…

अपने आस पास के घनीभूत पीड़ा संसार की व्यथा से उद्वेलित, छटपटाते और उसमें कोई सकारात्मक हस्तक्षेप या कोई भूमिका तलाशने की अपनी असफ़ल और निरर्थक प्रयासों से थके टूटते मन की संवेदनाओं की मर्मस्पर्शी और संवेदनशील अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

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