शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

आफिसिअल समोसों पर पलनेवाले चूहे


आफिसिअल समोसों पर
पलनेवाले चूहे
मालिक के आलू के बोरों को काटते हुए
सोचते हैं
कि दांत पजाते वर्षों हो गये
पर अपने सेठ का कुछ बिगड़ता नहीं
परकोटों पर पंख खुजाती चिड़ियों का संवाद
उन्हें जरा नहीं भाता
कि परिवर्तन में
कोई रुचि नहीं उनकी
कि जाने क्या खाती हैं ससुरी
कि दो जहानों की सैर कर आती हैं
एक हम हैं
कि नालियों के रास्ते सुरंग बनाते
उमर बीत गई
तमाम गोदामों में अंतर्जाल बना डाला
सुराखों के
इतने गुप्त संवाद किये
पर मायूसी लटकती रही हमारे चेहरों पर
बारहमासा
और ये हैं
कि बस चहचहाती फिरती हैं
दसों दिसाओं में ...मूर्खायें .  

1 टिप्पणी:

वन्दना ने कहा…

बेहद गहन अभिव्यक्ति।

फेशबुक - एक आत्‍मालोचना

अपना चेहरा उठाए खडे हैं हम बारहा मुकाबिल आपके अब आंखें हैं पर द़ष्टि नहीं है मन हैं पर उसकी उडान की बोर्ड से कंपूटर स्‍क्रीन तक है...