शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

तुम्‍हारी उदासी के कितने शेड्स हैं विनायक सेन

जानता हूं विनायक सेन
बीमारी अंधकार और लौहदंडों के घेरे में
दम घुट रहा है तुम्‍हारा
दम घुट रहा है जनाकांक्षाओं का
पर देखो तो
तुम्‍हारी उदासी उद्भासित हो रही है कैसी
बज रही है कितने सुरों में
कि कतने शेड्स है इसके

यहां बाजू में घास पर बैठे हैं मंगलेश जी
चुप्‍पा हकबकाए से
आधा सिर हिलाते
कि नहीं
ठीक ऐसा नहीं है
कि जिगर फिगार अवाम की कीमत पर ली गयी
उधार की यह चमक
मुझे मंजूर नहीं

पास ही घुटनों के बल झुकी हैं भाषा सिंह
विस्‍फारित नेत्रों में बच्‍चों सा विस्‍मय भरे
अपने धैर्य को मृदु हास्‍य में बदलती
कुछ बतिया रही हैं रंजीत वर्मा से
वहीं उबियाए से बैठे हैं मदन कश्‍यप,रामजी यादव
कि तमाशा खडा करना हमारा मकसद नहीं
दाएं बाजू सामने चप्‍प्‍ल झोला रखे
बैठे हैं अजय प्रकाश
अपनी खिलंदडी मुस्‍कान के साथ
सरल हास्‍य में डूबी नजरों से ताकती प्रेमा को दिखलाते
कि वो तो रही नंदिता दास
वही
फिराक वाली नंदिता दास
दीप्‍ती नवल की खनकती निगाह को
यतीम कर दिए गए बच्‍चे के दर्द में डुबोकर
जड कर देने वाली नंदिता दास

उधर पीछे खडे हैं अभिषेक
अपनी ही चर्बी के इंकिलाब से अलबलाए
कि भईवा इ पानी है कि गर्म चाय
पास ही मुस्‍का रहे हैं अंजनी

कितने शेड्स हैं तुम्‍हारी उदासी के
उधर कितने अनमने से खडे हैं अनिल चमडिया
कि साहित्‍य अकादमी की धूमिल होती इस सांझ में
शामिल हो रहा है रंग खिलते अमलतास का
कि बजती है एक अंतरराष्‍ट्रीय धुन
कि सब तुम्‍हारे ही लिए हैं मेरी कुटुबुटु
कि चलता है रेला लोकधुन का
और फुसफुसते हैं लोग
कि यह राजस्‍थानी है कि गुजराती
कि भुनभुनाता है एक
कि यहां इस प्रीत के बोल की जरूरत क्‍या है

जरूरत है साथी
कि प्रीत के बोलों पर
अभिषेक और ऐश्‍वर्या की ही इजारेदारी नहीं
कि वे अपनी भूरी कांउस आंखों पर भी
कजरारे-कजरारे गवा लें
और पूरा मुलुक ताकता रह जाए
मुलुर-मुलुर

कि इन बोलों पर
फैज – नेरूदा – हिकमत का भी अधिकार है
कि प्रीत के बोलों पर उनका ही अधिकार है
जो अपनी धुन में चले चलते हैं
मौत से हमबिस्‍तर होने के लिए

हां ये सब
तुम्‍हारी उदासी के ही शेड्स हैं विनायक सेन
उदासी की ही धुन है यह
जिस पर नाच रहे हैं इतने सारे जन-गन
बौद्धिक-कवि-पत्रकार
सबको लग रहा है कि
यह उदासी है
कि वे हैं।
पाखी  अक्टूबर  अंक  में  प्रकाशित 

1 टिप्पणी:

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