सोमवार, 20 मार्च 2017

मुखर बौद्धिक कवि : कुमार मुकुल ... कृष्ण समिद्ध

( आज मुकुल जी को दुसरी बार सुना...मुझे उनके स्वेत धवल बालों से जलन हैं...वो मुझे भी चाहिए था .)
कविता तब दीर्घजीवी होती है ....जब समय को लांघकर बार बार प्रासंगिक बनी रहे और कुमार मुकुल की कविता ऐसी ही है....
" आफिसिअल समोसों पर
पलनेवाले चूहे
मालिक के आलू के बोरों को काटते हुए
सोचते हैं
कि दांत पजाते वर्षों हो गये
पर अपने सेठ का कुछ बिगड़ता नहीं "
                        पर कुमार मुकुल मूलतः मुझे मुखर बौद्धिक कवि लगते हैं. मुखर इसलिए कि वो सबकुछ कह देना चाहते हैं..... उनकी कविता में हर विषय आ ही जाते हैं और बौद्धिक इसलिए कि वह हर विषय पर अपना निष्कर्ष भी देते चलते हैं..... वो जब प्रेम पर भी बात करते हैं तो उनकी सोच ...उनका निष्कर्ष वहाँ भी रहता है.
 " इजाडोरा कहती है -
प्रेम
शरीर की नहीं
आत्माक की बीमारी है "
(वॉन गॉग की उर्सुला)
                           2013 में कुमार मुकुल का 'अंधेरे में कविता के रंग' नामक काव्यालोचना का आना कोई आश्चर्य नहीं बल्कि उनका स्वाभाविक विकासमात्र है.... उनकी कविता में ...शुरू से ही ...उनका मुखर वक्तव्य काव्यालोचना गढ़ती रही है. कहुँ तो उनका पत्रकार कविता लिखते वक्त चुप नहीं बैठता ....बल्कि वो सब कुछ बोल देना चाहता है जो आज की पत्रकारिता में कह पाना बहुत संभव नहीं है. उनकी खुली घोषणा है...उनके कवि होने की बुनियाद .....दर्द की ठीस को संभालना है.......
"कि हमारा रिश्ता ही दर्द का है
जिसकी टीस को
जब संभाल लेती है मेरी कविता
तब कविता का महान व्योपार
कर पाती है वह"
( अपने कवि होने की बुनियाद )
और उनकी नज़र से दर्द छुपता भी नहीं है. अपनी कविता की भाषा के सीमित होने का दर्द भी उनकी चिंता में शामिल है.
" गुलाम हो चुकी भाषा के व्याकरण को "
या सामाजिक प्रश्न पर भी जड़ तक जाते हैं
"हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है"
(मैं हिन्दूा हूँ )
               कुमार मुकुल की दर्द बयाँ करनी की बेचैनी .... उस पर वक्तव्य देते जाने की धुमिल वाली मुखरता ...उनकी बड़ी ताकत है. जब भी इस समय का हिसाब किया जायेगा ... कुमार मुकुल की कविता सक्षम स्रोत होगी. पर यही ताकत कई जगह उनकी सीमा भी बन जाती है....और कभी कभी वो ज्यादा कह जाते हैं ...
.....कुमार मुकुल मुझे वहाँ पसंद आते हैं ....जहाँ उनके मुखर वक्तव्य थोड़ा आराम करते हैं और उनका व्यक्तित्व सामने आता है.. और जब नेट चैट पर इंतजार करते प्रेम कविता लिखते हैं.....तब उनका बौद्धिक वक्तव्य जीवन प्रेम की ऊष्मा के साथ घुलमिल कर चौंकाने वाली दृष्टि के साथ सामने आती है.
"दुनिया के क्रूरतम तानाशाह भी
अपने भीतर समेटते रहते हैं
एक बिखरती उर्सुला "
(वॉन गॉग की उर्सुला )      
            .…......तानाशाह भी तानाशाह न होते जो उनकी उर्सुला न बिखरती..... तानाशाह को इस अनुभूति से देख पाने का साहस और बिंब बेजोड़ है......साथ ही प्रेम के महत्व को बताता ही है.
और जीवन का यह बिंब भी मेरे साथ कई दिनों तक रहा......
नदी में पानी नहीं
फिर भी यह पुल
पुल है
( नदी और पुल )
             नया संग्रह ' एक उर्सुला होती है' प्रमाण है कि कवि कुमार मुकुल का विकास जारी है और वह अपनी सीमाएं लांघ रहें हैं. यह संग्रह पढ कर आनंद आयेगा. और मुझे इंतजार रहेगा जब कुमार मुकुल शमशेर की तरह सहज विकास कर सामने आयेंगें. और तब कुमार मुकुल बड़े कवि होंगे.
बकौल उनके
"होशो - हवाश के मिरे क्या कहने , 
सिराने मीर था जो पैताने कबीर जा बैठा। "

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